हैज़, निफ़ास और इस्तेहाज़ा में ख़्वातीन के लिए शरई हुक्म
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*🥀 हैज़, निफ़ास और इस्तेहाज़ा में ख़्वातीन के लिए शरई हुक्म 🥀*
✏️ देखें, जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में हैज़, निफ़ास और इस्तेहाज़ा के बारे में जाना, और अब हम इस पोस्ट में ये जानेंगे कि इन नापाकी के दिनों में ख़्वातीन के ऊपर क्या शरई हुक्म हैं, वो क्या कर सकती हैं और क्या नही, इस पोस्ट में बहुत सी उन बातों को भी बताया गया है जिनके बारे में अवाम में बहुत सी गलत फहमियां हैं इस लिए पूरा पोस्ट पढ़ें,
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*▪️हालते हैज़ और निफ़ास में (हैज़ और निफ़ास के दिनों में)*
▪️ जिस औरत को तीन दिन रात के बाद हैज़ बन्द हो गया और आदत के दिन अभी पूरे न हुए या निफास का खून आदत पूरी होने से पहले बन्द हो गया तो बन्द होने के बाद ही गुस्ल करके नमाज़ पढ़ना शुरू कर दें आदत के दिनों का इन्तिज़ार न करे, और आदत के दिनों से खून आगे बढ़ गया तो हैज़ में दस और निफ़ास में चालीस दिन तक इन्तिज़ार करे, अगर इस मुद्दत के अन्दर बन्द हो गया तो अब से नहा धोकर नामज पढे और जो इस मुद्दत के बाद भी जारी रहा तो नहाये और आदत के बाद बाकी दिनों की कज़ा करे,
▪️ हैज़ या निफास आदत के दिन पूरे होने से पहले बन्द हो गया तो आखिर मुस्तहब वक़्त तक इन्तिज़ार करके नहा कर नमाज़ पढ़े और जो आदत के दिन पूरे हो चुके तो इन्तिजार की कोई ज़रूरत नहीं,
▪️ हैज़ और निफास वाली औरत को कुरआन मजीद देखकर या ज़बानी पढ़ना और उसका छूना अगर्चे उसकी जिल्द या चोली या हाशिये को हाथ या उंगली की नोक या बदन का कोई हिस्सा लगे यह सब हराम हैं, कागज़ के पर्चे पर कोई सूरह या आयत लिखी हो तो उसका भी छूना हराम है, जुज़दान में कुरआन मजीद हो तो उस जुजदान के छूने में हर्ज नहीं,
▪️ हैज़ और निफास की हालत में कुर्ते के दामन या दुपट्टे के आँचल से या किसी ऐसे कपड़े से जिसको पहने या ओढ़े हुये हो उससे कुरआन मजीद छूना हराम है, गर्ज इस हालत में कुरआन मजीद और दीनी किताबें पढ़ने और छूने के बारे में वही सब अहकाम हैं जो उस शख्स के बारे में हैं जिस पर नहाना फर्ज़ है और जिनका बयान गुस्ल के बाब में गुजर चुका है,
▪️ मुअल्लिमा को हैज़ या निफास हुआ तो एक एक कलिमा सांस तोड़ - तोड़ कर पढ़ाये और हिज्जे कराने में कोई हर्ज नहीं, दुआये कुनूत पढ़ना उस हालत में मकरूह है,
▪️ हैज़ और निफास के दिनों में कुरआन मजीद के अलावा और तमाम अज़कार कलिमा शरीफ और दुरूद शरीफ वगैरा पढ़ना जाइज़ है मकरूह नहीं बल्कि मुस्तहब है और इन चीजों को वुजू या कुल्ली कर के पढ़ना बेहतर है और वैसे ही पढ़ लिया जब भी हर्ज नहीं और उनके छूने में भी हरज नहीं,
▪️ रोज़े की हालत में हैज़ या निफास शुरू हो गया तो वह रोज़ा जाता रहा उसकी कज़ा रखे अगर रोज़ा फर्ज़ था तो कज़ा फर्ज़ है और नफ्ल था तो कज़ा वाजिब है,
▪️ हैज़ और निफास की हालत में सजदए शुक्र और सजदए तिलावत हराम है और आयते सजदा सुनने से उस पर सजदा वाजिब नहीं,
▪️ अगर सोते वक़्त औरत पाक थी और सुबह को सोकर उठी तो हैज़ का असर देखा तो उसी वक़्त से हैज़ का हुक्म दिया जायेगा और इशा की नमाज़ नहीं पढ़ी थी तो पाक होने पर उसकी कज़ा फर्ज़ है, और अगर हैज़ के आखिर दिनों में सो कर उठी और गद्दी पर कोई निशान हैज़ का नहीं तो रात ही से पाक है नहा कर इशा की कज़ा पढ़े,
▪️हैज़ की हालत में सोहबत हमबिस्तरी (सम्भोग) हराम है, ऐसी हालत में सोहबत को जाइज़ जानना कुफ्र है और हराम समझ कर लिया तो सख्त गुनहगार हुआ उस पर तौबा फर्ज़ है, और हैज़ के आने के ज़माने में किया तो एक दीनार और खत्म होने के करीब किया तो आधा दीनार खैरात करना मुस्तहब है
▪️हैज़ व निफ़ास वाली औरत को अज़ान का जबाब देना जाइज़ है,
▪️ हैज़ व निफ़ास वाली औरत को मस्जिद में जाना हराम है, हां हाथ बढ़ाकर कोई चीज़ मस्जिद से लेना जाइज़ है, और ईदगाह के अन्दर जाने में कोई हर्ज नहीं है,
▪️ खानाए काबा के अन्दर जाना और उसका तवाफ करना अगर्चे मस्जिदे हराम के बाहर से हो उनके लिए हराम है,
▪️ इस हालत में रोज़ा रखना और नमाज पढ़ना हराम है, इन दिनों में नमाजें मुआफ हैं उनकी कज़ा भी नहीं और रोज़ों की क़ज़ा दूसरे दिनों में रखना फर्ज़ है,
▪️ नमाज़ का आखिर वक़्त हो गया और अभी तक नमाज़ नहीं पढ़ी कि हैज़ आया या बच्चा पैदा हुआ तो उस वक़्त की नमाज़ मुआफ हो गई, अगर्चे इतना तंग वक़्त हो गया हो कि उस नमाज़ की गुन्जाइश न हो,
▪️ नमाज़ पढ़ने में हैज़ आ गया या बच्चा पैदा हुआ तो वह नमाज़ मुआफ है अलबत्ता अगर नफ्ल नमाज़ थी तो उसकी कज़ा वाजिब है,
▪️ नमाज़ के वक़्त में वुजू कर के उतनी देर तक ज़िक्रे इलाही दूरूद शरीफ और वजीफे पढ़ लिया करे जितनी देर तक नमाज़ पढ़ा करती थी कि आदत रहे,
▪️ अपने साथ खिलाना या एक साथ सोना जाइज़ है बल्कि इस वजह से साथ न सोना मकरूह है, इस हालत में औरत मर्द के बदन के हर हिस्से को हाथ लगा सकती है, औरत के नाफ से ऊपर और घुटने से नीचे छूने या किसी और तरह का नफा लेने में कोई हर्ज नहीं, यूँही चूमना भी जाइज़ है, लेकिन नाफ के नीचे से गुठने के ऊपर तक औरत के बदन का अपने किसी उज्व से छूना जाइज़ नहीं जबकि कपड़ा या किसी और चीज़ की रुकावट न हो शहवत से हो या बे शहवत और अगर ऐसा हाइल हो कि बदन की गर्मी महसूस न होगी तो कोई हर्ज नहीं,
▪️ अगर साथ सोने में शहवत के ज्यादा होने और अपने को काबू में न रख सकने का खतरा हो तो साथ न सोये और अगर गालिब गुमान हो तो साथ सोना गुनाह है,
▪️ हैज़ पूरे दस दिन पर खत्म हुआ तो पाक होते ही औरत से सोहबत करना जाइज़ है अगर्चे अब तक न नहाई हो मगर मुस्तहब यह है कि नहाने के बाद सोहबत करे,
▪️ आदत के दिन पूरे होने से पहले ही खत्म हो गया तो अगर्चे गुस्ल कर ले सोहबत नाजाइज़ है जब तक कि आदत के दिन पूरे न हों जैसे किसी की आदत छह दिन की थी और इस बार पाँच ही दिन आया तो उसे हुक्म है कि नहा कर नमाज़ शुरू कर दे मगर सोहबत के लिए एक दिन और इन्तिजार करना वाजिब है,
▪️यानी कि हैज़ और निफ़ास के एक ही हुक्म हैं, जो बातें हैज़ में मना हैं वो निफ़ास में भी मना हैं,
*▪️अब इस्तेहाज़ा के मसाएल देखें*
इस्तेहाज़ा यानी वो खून आना जो ना तो हैज़ है और ना निफ़ास और ये बीमारी की वजह से भी होता है,
▪️इस्तिहाजा में न नमाज़ मुआफ है न रोज़ा और न ऐसी औरत से सोहबत हराम है जैसा कि हैज़ और निफ़ास में मना है,
इस्तेहाज़ा में दो हद होती हैं एक जो कि गैर माज़ूर हैं और दूसरी वो जो कि माज़ूर हैं, इनकी तफसील देखें_
*01 ग़ैर माज़ूर* जिनको हल्का फुल्का खून आता है, और उनको वुज़ू बना कर नमाज़ अदा करने की मोहलत मिल जाती है इस बीच उनको खून नही आता, या कपड़ा वगैरा रख कर इतनी देर तक खून रोक सकती है कि वुज़ू करके फ़र्ज़ पढ़ ले तो वो माज़ूर नही
*01 ग़ैर माज़ूर* वो ख़वातीन जिनको इतना खून आता है कि वो एक बार वुज़ू करके नमाज़ अदा नही कर सकती, क्यूंकि उनको हर वक्त खून आते रहता है, और नमाज़ का वक़्त शुरू से ले कर आखिर तक ऐसे ही गुज़र जाता है तो इनको माज़ूर कहा जायेगा,
▪️अब अगर कोई माज़ूर है तो उनके लिए आसानी ये है कि वो ऐसा करें कि जब नमाज़ पढ़नी हो तो साफ कपड़े पहने या अगर जो पहने हुए हैं वो कपड़ा पाक है तो भी ठीक है, और शर्मगाह में कोई कपड़ा या पैड लगा ले फिर वुज़ू करके जितनी चाहें नमाज़ पढ़ें, अब खून आने से उसका वुजू न जायेगा, हां जैसे ही ये नमाज़ का वक़्त खतम होगा वो वुज़ू खुद से ही टूट जाएगा, जैसे किसी ने अस्र के वक़्त वुज़ू किया था तो आफताब के डूबते ही वुज़ू जाता रहा, और या फिर खून आने के अलावा कोई और ऐसा काम किये जिससे कि वुज़ू टूट जाता तो फिर वुज़ू टूट जाएगा वरना नही,
▪️अगर कोई ख़्वातीन मज़ूर थी लेकिन अब इतना मौका मिलता है कि वुजू कर के नमाज़ पढ़ ले मगर अब भी एक आध बार हर वक़्त में खून आ जाता है तो अब भी माजूर है,
*▪️अब अवाम में फैली हुई गलतफहमियां देखें*
निफास में औरत का जच्चाखाने से निकलना जाइज है, उसको साथ खिलाने या बल जाने उसका झूठा खाने में हरज नहीं, हिन्दुस्तान में जो कुछ जगह उनके बर्तन तक अलग कर देते हैं बल्कि उनके बर्तनों को नापाक बर्तनों की तरह सझते हैं यह गलत है, यह हिन्दुओं की ऐसी बेहूदा रस्मों से बचना जरूरी है, अकसर औरतों में यह रिवाज़ है कि जब तक चिल्ला पूरा न हो ले अगर्चे निफास खत्म हो लिया हो न नमाज पढ़ें न अपने को नमाज के काबिल ये सरासर जिहालत है,
▪️हैज़ व निफ़ास और इस्तेहाज़ा वाली औरतें नापाक कपड़े धो सकती हैं इसमे ऐसा नही की उनके धोने से कपड़ा पाक ना होगा,
▪️ईन दिनों में औरतें शिरिनी व तबर्रुक भी बना सकती हैं कोई हर्ज नही,
▪️और साथ ही वो इन दिनों में मेहन्दी भी लगा सकती हैं इसमे कोइ जाएज़ और नाजाएज़ वाली बात नही, चाहे हाथ मे लगाएँ या पैर में,
📚 *बहारे शरीअत, जिल्द 01, हिस्सा 02, सफ़ह 67-71*
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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